Sunday, May 10, 2009

बंधन

बन्धन दो जीवन भर का ,बन्धन का आभास न दो ,मृगतृष्णा हो जाए जीवन ,मुझको ऐसी प्यास न दो .मुट्ठी भर दे दो अपनापन ,ये सारा आकाश न दो ,बस कुछ पल दे दो अपने ,लोगों का उपहास न दो ,कुछ पल का है प्यार तुम्हारा,तुम ऐसा विश्वास न दो ,सुधापान अधिकार मुझे दो ,यूँ निर्जल उपवास न दो ,प्रणय दान दे दो मुझको ,मुझको झूठी आस न दो ,अंतिम हो जाए जीवन की ऐसी कोई साँस न दो ,
इस तरह जब महिलाओं को जब वंचित कर दिया गया तो उन्होंने अपना आखिरी हथियार संभाला और संसद तथा विधान सभाओं में अपने लिए सीटों के आरक्षण का मुद्दा उठाया .राजनैतिक दल जो हर बात को वोट बैंक से जोड़ कर देखते है इस मांग से सहमति दिखाते नजर आए .खेद की बात है की यह भी एक धोखा ही साबित हुआ .लेकिन एक दूसरा पहलू भी है .एक ऐसे समय में जब जातपात एक ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल हो रही है कुछ राजनीतिज्ञ यह चाहते हैं की इस आरक्षण में पिछडे वर्गों और अल्पसंख्यकों के लिए भी जगहनिकाली जाए .लेकिन बात केवल इतनी सी नही है .एक सर्वे से यह पता चला है की सामान्य रूप से इस बिल में किसी को कोई दिलचस्पी नही है .सचमुच दो मुहीबात बात करने का यह एक बड़ा उदहारण है .जनता के सामने तो राजनीतिज्ञ महिलाओं के आरक्षण का पक्ष ले रहे थे लेकिन संसद के बाहर वे इसे दबाने में लगे हुए थे .कारण बहुत साफ़ है पुरूष यह नही चाहते की वे गद्दी से कभी उतरे .आख़िर आगे रहना कौन नही चाहता । समाप्त

Wednesday, April 22, 2009

अधिकार

संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है .आज़ादी के पचास वर्षों के बाद भी यदि हम बच्चों की मृत्यु के आंकडे देखें या शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर नजर डालें तो प्रतीत होगा की महिलाओं के संबध में काफी भेदभाव पाया गया है .करीब -करीब पूरेविश्वास के साथ ये कहा जा सकता है हमारे राजनीतिक ढांचे में भी इस सम्बन्ध में भेदभाव देखने में आता है .हमारी तेरहवी लोकसभा में ५४३ में से केवल ४३ महिला संसद सदस्य थी .ये कोई आश्चर्यजनक आंकडा नही है क्योंकि किसी भी समय संसद में महिलाओं की संख्या दस प्रतिशत सेज्यादा नही रही है.बड़े राजनीतिक दलों के चुनावी मुद्दों में महिलाओं की साझेदारी पर काफी बल दिया जाता है पर अफ़सोस ;ये सब केवल दिखावा है .क्रमशः