Sunday, May 10, 2009

इस तरह जब महिलाओं को जब वंचित कर दिया गया तो उन्होंने अपना आखिरी हथियार संभाला और संसद तथा विधान सभाओं में अपने लिए सीटों के आरक्षण का मुद्दा उठाया .राजनैतिक दल जो हर बात को वोट बैंक से जोड़ कर देखते है इस मांग से सहमति दिखाते नजर आए .खेद की बात है की यह भी एक धोखा ही साबित हुआ .लेकिन एक दूसरा पहलू भी है .एक ऐसे समय में जब जातपात एक ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल हो रही है कुछ राजनीतिज्ञ यह चाहते हैं की इस आरक्षण में पिछडे वर्गों और अल्पसंख्यकों के लिए भी जगहनिकाली जाए .लेकिन बात केवल इतनी सी नही है .एक सर्वे से यह पता चला है की सामान्य रूप से इस बिल में किसी को कोई दिलचस्पी नही है .सचमुच दो मुहीबात बात करने का यह एक बड़ा उदहारण है .जनता के सामने तो राजनीतिज्ञ महिलाओं के आरक्षण का पक्ष ले रहे थे लेकिन संसद के बाहर वे इसे दबाने में लगे हुए थे .कारण बहुत साफ़ है पुरूष यह नही चाहते की वे गद्दी से कभी उतरे .आख़िर आगे रहना कौन नही चाहता । समाप्त

3 comments:

  1. आपने बिल्कुल सही फ़रमाया है किंतु महिलाएं अगर आवाज़ उठती है तो उन्हें दबाने में भी महिलाये ही आगे आती है । तों बात सिर्फ़ इतनी सी है की आप कब तक दुसरे की ऊँगली पकड़ के चलती रहेंगी.............

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  2. aapane sahi kaha hai ki mahilao ko adhikar diya jana chahiye

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